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डीजल की कमी ने बढ़ाई चिंता, अमेरिका से भारत तक ईंधन आपूर्ति पर दबाव

नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की तुलना में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों और विशेष रूप से डीजल की भारी किल्लत ने दुनिया भर की सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और भारत समेत प्रमुख देश आपूर्ति के इस गंभीर संकट से निपटने के लिए जूझ रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर गहराता डीजल संकट

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट के पीछे केवल कच्चे तेल की कमी नहीं है, बल्कि इसके कई अन्य बड़े कारण भी हैं:

  • भू-राजनीतिक तनाव: युद्ध, रिफाइनरियों पर लगातार हमले और प्रमुख आपूर्ति मार्गों में आ रही बाधाओं ने स्थिति को गंभीर बना दिया है।

  • निर्यात प्रतिबंध और नियंत्रण: रूस द्वारा डीजल निर्यात पर प्रतिबंध बढ़ाए जाने और अमेरिका में निर्यात रोकने की चर्चाओं से बाजार में दबाव बढ़ गया है।

  • आसमान छूती कीमतें: यूक्रेन के हमलों से रूसी रिफाइनरियों की क्षमता प्रभावित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमत बढ़कर लगभग 1,500 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई है, जो सामान्य स्तर से लगभग दोगुनी है।

भारत के लिए दोहरी चुनौती और अवसर

भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है:

  • बढ़ती आयात लागत: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिसका असर सीधे तौर पर परिवहन, कृषि और आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है।

  • निर्यात के नए रास्ते: देश की विशाल रिफाइनिंग क्षमता के चलते पश्चिमी देशों में डीजल की कमी के बीच भारतीय रिफाइनरियों के लिए वैश्विक बाजार में निर्यात के नए अवसर खुल रहे हैं।

परिवहन और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव

डीजल संकट का प्रभाव केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है:

  • महँगा परिवहन: ट्रक, बस, निर्माण मशीनरी, कृषि उपकरण और जनरेटर मुख्य रूप से डीजल पर निर्भर हैं। ईंधन महँगा होने से खाद्यान्न और औद्योगिक कच्चे माल की ढुलाई लागत बढ़ जाती है।

  • कृषि पर असर: अमेरिका जैसे देशों में किसानों के लिए फसल कटाई की लागत में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

रणनीतिक भंडार और भविष्य की चुनौतियाँ

इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए जी-7 देशों ने 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल जैसे पेट्रोलियम भंडार बाजार में जारी करने का फैसला किया है। यूरोप भी अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का चेतावनी भरा कहना है कि यदि युद्ध और रिफाइनरियों पर हमले नहीं रुके, तो यह डीजल संकट 2027 तक खिंच सकता है। इस पूरी स्थिति ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया को केवल कच्चे तेल की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि रिफाइनिंग और आपूर्ति श्रृंखलाओं को भी मजबूत करने की सख्त जरूरत है।

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