दिल्लीराज्य

प्रदूषण के आंकड़ों पर उठे सवाल, AISA अध्यक्ष ने सरकार पर लगाए आरोप

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में लगातार गहराते वायु प्रदूषण के संकट के बीच ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने सरकार द्वारा पेश किए जा रहे प्रदूषण आंकड़ों और दावों की विश्वसनीयता पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन की तरफ से इस वर्ष दिल्ली में करीब 220 दिन हवा की स्थिति संतोषजनक और बेहतर रहने का दावा किया जा रहा है, किंतु जब इन आंकड़ों की निष्पक्ष जांच की जाती है तो धरातल पर वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। आइसा अध्यक्ष ने कहा कि जिन आंकड़ों को आधार बनाकर वायु गुणवत्ता में सुधार का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वे वास्तविक स्थिति को पूरी तरह से छिपाने का प्रयास करते हैं और जनता को भ्रमित करते हैं।

अक्टूबर माह की आबोहवा और मौसमी बदलावों का तर्क

नेहा बोरा ने हाल ही में अक्टूबर महीने को बीते एक दशक का सबसे साफ और स्वच्छ महीना बताए जाने वाले सरकारी दावे को भी निशाने पर लिया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि इस अवधि के दौरान हुई अनपेक्षित भारी वर्षा के असर को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। उनके अनुसार, अक्टूबर में हुई तेज बारिश के कारण हवा में फैले हानिकारक प्रदूषक तत्व और पार्टिकुलेट मैटर अस्थायी तौर पर धुलकर जमीन पर बैठ गए थे, जिसके परिणामस्वरूप कुछ दिनों के लिए वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में सुधार दर्ज किया गया था। आइसा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि कुदरती बारिश के प्रभाव से साफ हुई हवा को केवल प्रशासनिक नीतियों और प्रदूषण नियंत्रण उपायों की सफलता के रूप में प्रचारित करना सर्वथा अनुचित और भ्रामक है।

प्रदूषण नियंत्रण में पारदर्शिता और ठोस नीति की मांग

छात्र नेता ने आगे कहा कि जैसे ही बारिश का सिलसिला थमा, वैसे ही राजधानी में वायु प्रदूषण का स्तर पुनः खतरनाक स्थिति में पहुंच गया और हवा की गुणवत्ता बेहद खराब श्रेणी में दर्ज होने लगी। उन्होंने कहा कि बारिश थमते ही बिगड़ी आबोहवा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सरकारी तंत्र के पास प्रदूषण से निपटने का कोई स्थायी समाधान नहीं है। जब धुंध और स्मॉग के कारण स्थिति चिंताजनक हो गई, तब प्रशासनिक दावों की पोल पूरी तरह खुल गई। नेहा बोरा ने मांग की कि सरकार प्रदूषण से जुड़े तमाम आंकड़ों को पूर्ण पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक करे और मौसमी बदलावों के बजाय जमीनी धरातल पर अल्पकालिक व दीर्घकालिक ठोस प्रदूषण रोधी कदम उठाए।

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