कारोबारियों के लिए जरूरी खबर, GST रिटर्न के नए प्रारूप पर 1 नवंबर से शुरू होगा विचार-विमर्श

मुंबई| देश की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सरल और करदाता-अनुकूल बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के जीएसटी पॉलिसी विंग के कमिश्नर गौरव सिंह ने घोषणा की है कि वित्त मंत्रालय आगामी एक नवंबर से मासिक जीएसटी रिटर्न फॉर्म में प्रस्तावित संशोधनों पर उद्योग जगत और कारोबारियों से सार्वजनिक सुझाव मांगेगा। इस पहल का मुख्य उद्देश्य कर देनदारियों और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के विवरण में होने वाले अंतर को खत्म करना तथा करदाताओं को बेवजह मिलने वाले नोटिसों से राहत प्रदान करना है।
संशोधित फॉर्म जारी होने की समय-सीमा और सार्वजनिक परामर्श
सीबीआईसी के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, संशोधित जीएसटी रिटर्न फॉर्म को एक नवंबर को सरकार के 'मायगॉव' पोर्टल पर परामर्श के लिए अपलोड कर दिया जाएगा। देश भर के व्यापारी, उद्योग संगठन और कर विशेषज्ञ एक नवंबर से तीस नवंबर तक अपनी राय और टिप्पणियां दर्ज करा सकेंगे। इसके अलावा, हाल ही में आयोजित जीएसटी काउंसिल की 57वीं बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों से संबंधित अधिसूचनाओं और परिपत्रों की कानूनी समीक्षा पूरी हो चुकी है, जिन्हें जल्द ही सार्वजनिक पटल पर जारी किया जा रहा है।
रिटर्न फॉर्मों में सुधार और ऑडिट प्रक्रिया का सरलीकरण
जीएसटी काउंसिल की बैठक में देनदारियों और इनपुट टैक्स क्रेडिट के बेमेल विवरणों में संशोधन के लिए एक वैकल्पिक तंत्र को स्वीकृति दी गई है। इसके तहत मासिक फॉर्म GSTR-1, GSTR-1A और चालान प्रस्तुत करने की सुविधा (IFF) में व्यापक सुधार किए जा रहे हैं ताकि इनका सटीक मिलान GSTR-3B फॉर्म से हो सके। इससे फर्जी दावों पर लगाम लगेगी। साथ ही, कई राज्यों में कारोबार करने वाली कंपनियों को अलग-अलग ऑडिट प्रक्रियाओं से होने वाली असुविधा से बचाने के लिए सीबीआईसी ऑडिट व्यवस्था को भी सुव्यवस्थित करने पर काम कर रहा है।
नए रिटर्न फॉर्म लागू होने की तिथि और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस
सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद ये संशोधित जीएसटी रिटर्न फॉर्म एक अप्रैल दो हजार सत्ताइस से देशभर में लागू कर दिए जाएंगे। यह समयसीमा व्यवसायियों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स को अपनी लेखा प्रणाली में आवश्यक तकनीकी बदलाव करने का पर्याप्त अवसर प्रदान करेगी। सार्वजनिक परामर्श की इस प्रक्रिया से नीति निर्धारण में उद्योग जगत की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे न केवल व्यापार करने में आसानी होगी बल्कि देश में कर अनुपालन का ढांचा भी मजबूत बनेगा।



